कैसे हुई शुरुआत मकर संक्रांति की ।। मकर संक्रांति 2020


मकर संक्रांति की शुरुआत कैसे हुई कहां से मकर संक्रांति आई है आई है जानने का प्रयास करते हैं


मकर-संक्रांति-2020


हमारे देश में जब भी कोई त्यौहार मनाया जा है  तो  उस त्‍योहार के पीछे कोई न कोई इतिहास और संदेश जरूर होता है। मकर संक्रांति भी उन्‍हीं में से एक है। वैसे तो यह पर्व पूरे देश में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। लेकिन इस दिन ख‍िचड़ी बनाए जाने की परंपरा कई प्रदेशों में है। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इसके पीछे क्‍या कहानी है?

 आखिर इसकी शुरुआत हुई कैसे?

आइए जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई थी जब कभी भी हम इसके बारे में जानने का प्रयास करते हैं तो हमारे सामने एक महत्वपूर्ण नाम आता है जोकि है बाबा गोरखनाथ का

 1 - ऐसे की थी शुरुआत बाबा गोरखनाथ ने








यदि हम कथाओं की माने तो हमारे सामने यह बात आती है कि जब खिलजी ने आक्रमण किया था तो लगातार संघर्षरत रहने के चलते नाथ योगी भोजन तक नहीं कर पाते थे इसके पीछे कारण यह माना जाता था कि आक्रमण के  चलते योगी के पास भोजन बनाने का समय नहीं बचता था ऐसा इसलिए होता था क्योंकि वह अपनी जमीन को बचाने के लिए ही संघर्ष करते रहते थे और अक्सर वे भूखे रह जाते थे



2 -  पहली बार खिचड़ी बनाई थी  नाथ योगी उन्हें

मकर-संक्रांति-2020





कथाओं के अनुसार  खिलजी के साथ आक्रमण में संघर्षरत रहने के दौरान नाथ योगी भूखे रहते थे जिस समस्या का समाधान के लिए बाबा गोरखनाथ ने एक उपाय सूची और खिचड़ी बनाने के लिए दाल चावल सब्जी इतिहास को एक में मिक्स करके बनाने का उपाय किया जिससे कि समय बचे और योगी भूखे भी ना रहे





3- नाथ योगी योगियों ने  व्यंजन का लिया स्वाद 










बाबा गोरखनाथ का बताया गया हुआ यह व्‍यंजन नाथ योगियों को बेहद पसंद आया। इसे बनाने में काफी कम समय तो लगता ही था। साथ ही काफी स्‍वादिष्‍ट और त्‍वरित ऊर्जा देने वाला भी होता था। कहा जाता है कि बाबा ने ही इस व्‍यंजन को खिचड़ी का नाम दिया।
4- हो गया परेशानियों का समाधान


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कहा जाता है कि फटाफट तैयार होने वाले इस व्‍यंजन से नाथ योगियों को भूख की परेशानी से राहत मिल गई। इसके अलावा वह खिलजी के आतंक को दूर करने में भी सक्षम हुए। इसके बाद से ही गोरखपुर में मकर संक्रांति के दिन को बतौर विजय दर्शन पर्व के रूप में भी मनाते हैं।

5- गोरखनाथ मंदिर के पास मेले का आयोजन


मकर संक्रांति के अवसर पर गोरखनाथ मंदिर के पास खिचड़ी मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले की शुरुआत बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाकर होती है। इसके बाद प्रसाद स्‍वरूप पूरे मेले में खिचड़ी का वितरण भी किया जाता है।

6- खिचड़ी से होती है आरोग्‍य में वृद्ध‍ि


ज्‍योतिषशास्‍त्र की माने तो खिचड़ी का मुख्‍य तत्‍व चावल और जल चंद्रमा के प्रभाव में होता है। इस दिन खिचड़ी में डाली जाने वाली उड़द की दाल का संबंध शनि देव से माना गया है। वहीं हल्‍दी का संबंध गुरु ग्रह से और हरी सब्जियों का संबंध बुध से माना जाता है। वहीं खिचड़ी में पड़ने वाले घी का संबंध सूर्य देव से होता है। इसके अलावा घी से शुक्र और मंगल भी प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने से आरोग्‍य में वृद्धि होती है।

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7 - तिल और तिलकुट खाने की भी परंपरा


मकर संक्रांति पर तिल और तिलकुट खाने की भी परंपरा है। ज्‍योतिषीय कारणों के मुताबिक तिल का सीधा संबंध शनि से है। यही वजह है कि मकर संक्रांति के दिन तिल और तिलकुट खाने का रिवाज है। इससे शनि, राहू और केतु से संबंधित सारे दोष दूर हो जाते हैं।



8- दही-चूड़ा तिलबा की परंपरा


मकर संक्रांति प्रकृति की आराधना का पर्व है जो सूर्य के उत्तरायण होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यही कारण है कि कड़ाके की ठंड में लोग सूर्योदय से पूर्व स्नान करके सूर्य को अर्घ्‍य देते हैं। इसके बाद तिलाठी (तिल के पौधे का ठंडल) जलाकर खुद को गर्म करते हैं और पहले दही-चूड़ा तिलबा (तिल का लड्ड) खाते हैं।

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